डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय के प्रो. अथोकपम के. सिंह विश्व के शीर्ष 2% वैज्ञानिकों में शामिल: वैश्विक स्तर पर हासिल की 116वीं रैंक सागर (मध्यप्रदेश)। डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर के व्यावहारिक भूविज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. अथोकपम कृष्णकांत सिंह ने वैश्विक स्तर पर विश्वविद्यालय और देश का नाम रोशन किया है।
अमेरिका के प्रतिष्ठित स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय और एल्सेवियर द्वारा संयुक्त रूप से जारी वर्ष 2026 की वैश्विक रैंकिंग में प्रो. सिंह को विश्व के शीर्ष 2% वैज्ञानिकों की सूची में शामिल किया गया है। उन्होंने भूविज्ञान (Geology) के क्षेत्र में विश्व स्तर पर 116वीं सबफील्ड रैंक हासिल कर अपनी शोध उत्कृष्टता का लोहा मनवाया है।आग्नेय पेट्रोलॉजी और टेक्टोनिक्स में उत्कृष्ट योगदानप्रो. सिंह आग्नेय पेट्रोलॉजी (Igneous Petrology), भू-रसायन
(Geochemistry), भू-कालक्रम (Geochronology), खनिजकरण और हिमालयन टेक्टोनिक्स के क्षेत्र में देश के अग्रणी शोधकर्ताओं में गिने जाते हैं। * क्रस्ट और मेंटल विकास का अध्ययन: उनका शोध मुख्य रूप से महाद्वीपीय टकराव, सबडक्शन (Subduction) और आब्डक्शन जैसी जटिल भूगर्भीय प्रक्रियाओं के दौरान भूपर्पटी (Crust) और लिथोस्फेरिक मेंटल के भू-गतिशील विकास (Geodynamic Evolution) को समझने पर केंद्रित है।

* अत्याधुनिक तकनीकों का समन्वय: वे अपने अनुसंधान में संपूर्ण-चट्टान भू-रसायन, खनिज रसायन, समस्थानिक विश्लेषण तथा यूरेनियम-लेड (U-Pb) जियोक्रोनोलॉजी जैसे एकीकृत दृष्टिकोण का उपयोग करते हैं। * रणनीतिक एवं दुर्लभ खनिज संसाधन: प्रो. सिंह ने क्रोमाइट्स व मेंटल पेरिडोटाइट्स में निकिल-कॉपर-प्लेटिनम समूह के तत्वों (PGE) के साथ-साथ दुर्लभ पृथ्वी तत्वों (REE) और महत्वपूर्ण दुर्लभ-धातु खनिजीकरण की संभावनाओं पर गहन पड़ताल की है।
* हिमालय और भारत-म्यांमार ओफियोलाइट्स: उन्होंने हिमालय और पूर्वोत्तर भारत के भारत-म्यांमार ओरोजेनिक बेल्ट के प्रमुख सूचर जोन्स में ओफियोलाइट निर्माण के दौरान मेंटल की भौतिक और रासायनिक स्थितियों पर महत्वपूर्ण डेटा प्रस्तुत किया है। साथ ही, पश्चिमी भारत के मालानी इग्नीयस सूट पर किए गए उनके अध्ययन ने नियोप्रोटेरोजोइक ‘रोडिनिया’ महाद्वीप के विघटन और भारतीय शील्ड के भू-इतिहास को समझने में अहम भूमिका निभाई है।

शैक्षणिक पृष्ठभूमि एवं राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सम्मानप्रो. सिंह का अकादमिक करियर कई प्रतिष्ठित फेलोशिप और राष्ट्रीय पुरस्कारों से सुसज्जित रहा है:
| विवरण | संस्थान / एजेंसी / संस्था | मुख्य उपलब्धि / शोध क्षेत्र ||—|—|—|| एम.एससी. एवं पीएच.डी. | कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, हरियाणा | एनोरोजेनिक कॉम्प्लेक्स में ए-टाइप मैग्माटिज्म और दुर्लभ-धातु खनिजीकरण || रिसर्च फेलोशिप | CSIR, नई दिल्ली | वरिष्ठ अनुसंधान फेलोशिप (SRF) || BOYSCAST फेलोशिप | विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST), भारत सरकार | द ओपन यूनिवर्सिटी, मिल्टन कीन्स (इंग्लैंड) में पोस्ट-डॉक्टोरल रिसर्च || एस. एम. नकवी स्वर्ण पदक – 2025 | जियोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया, बेंगलुरु | आग्नेय पेट्रोलॉजी और भू-रसायन में विशिष्ट योगदान हेतु सर्वोच्च सम्मान |
अनुसंधान, प्रकाशन और प्रयोगशाला निर्माणप्रो. सिंह के मार्गदर्शन में एक दर्जन से अधिक शोधार्थियों ने पीएच.डी. और कई शोधकर्ताओं ने पोस्ट-डॉक्टरल कार्य पूरा किया है। उनके 100 से अधिक उच्च-स्तरीय शोध पत्र लिथोस, गोंडवाना रिसर्च, प्रीकैम्ब्रियन रिसर्च, जियोसाइंस फ्रंटियर्स, इंटरनेशनल जियोलॉजी रिव्यू और कॉन्ट्रिब्यूशन्स टू मिनरलॉजी एंड पेट्रोलॉजी जैसे अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स में प्रकाशित हो चुके हैं, जिन्हें विश्वभर में हजारों साइटेशन्स मिले हैं।
वर्तमान में वे विली (Wiley) द्वारा प्रकाशित प्रतिष्ठित ‘जियोलॉजिकल जर्नल’ के एसोसिएट एडिटर के रूप में भी सेवा दे रहे हैं।वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान (WIHG), देहरादून में पूर्व वैज्ञानिक-एफ के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने वर्ष 2014 में अत्याधुनिक जियोक्रोनोलॉजी लैब (LA-MC-ICPMS) की स्थापना में केंद्रीय भूमिका निभाई थी। इसके अलावा वे ICP-MS, SEM, XRD और XRF जैसी उच्चस्तरीय विश्लेषणात्मक इंस्ट्रूमेंटेशन प्रयोगशालाओं के साइंटिस्ट-इन-चार्ज भी रह चुके हैं।

विश्वविद्यालय प्रशासन और संस्थागत नेतृत्ववर्तमान में प्रो. सिंह डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय में न केवल व्यावहारिक भूविज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष का दायित्व संभाल रहे हैं, बल्कि वे विश्वविद्यालय के डिप्टी प्रॉक्टर, ‘मध्य भारती: जर्नल ऑफ साइंस’ के संपादक और सत्र 2026-27 के लिए प्रवेश प्रकोष्ठ के मुख्य समन्वयक के रूप में भी प्रशासनिक जिम्मेदारियों का कुशलतापूर्वक निर्वहन कर रहे हैं।उनकी इस ऐतिहासिक वैश्विक उपलब्धि पर विश्वविद्यालय के शैक्षणिक समुदाय, शोधार्थियों और छात्रों ने उन्हें बधाई दी है। इस सम्मान से न केवल विश्वविद्यालय का गौरव बढ़ा है, बल्कि मध्य प्रदेश और देश के भूवैज्ञानिक अनुसंधान को अंतरराष्ट्रीय पटल पर नई पहचान मिली है।

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