प्रशासनिक सख्ती: जमीन के विवादों की जमीनी पड़ताललैंड जिहाद’ की अवधारणा, अवैध प्लॉटिंग का खेल

Bundele News
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पिछले कुछ समय से भारत के विभिन्न राज्यों, विशेषकर मध्यप्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और असम जैसे क्षेत्रों में ‘लैंड जिहाद’ (Land Jihad) शब्द सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों तक काफी चर्चा में है। इस नैरेटिव के तहत स्थानीय संगठनों और कुछ राजनीतिक नेताओं का दावा है कि जमीन के इस कथित खेल में अब बिना रेरा (RERA) की अनुमति के अवैध कॉलोनियां काटने और अवैध प्लॉटिंग (Illegal Plotting) का एक नया ट्रेंड तेजी से पैर पसार रहा है।

आइए विस्तार से समझते हैं कि इस अवधारणा के पीछे क्या तर्क और कार्यप्रणाली बताई जाती है, रेरा के नियमों का उल्लंघन कैसे किया जाता है, और इस पर कानून व प्रशासन का क्या रुख है।

‘लैंड जिहाद’ की कथित कार्यप्रणाली: मुख्य बाजारों से लेकर अवैध प्लॉटिंग तक

इस नैरेटिव (Narrative) को मानने वाले लोगों और संगठनों का दावा है कि यह एक सोची-समझी आर्थिक और भौगोलिक रणनीति है, जिसके तहत निम्नलिखित चरणों का पालन किया जाता है:

मुख्य बाजारों में पैठ: शुरुआती चरण में किसी भी शहर या कस्बों के मुख्य व्यापारिक केंद्रों (Main Markets) में दुकानें किराए पर ली जाती हैं या ऊंचे दामों पर खरीदी जाती हैं ताकि स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पकड़ मजबूत की जा सके।

विवादित और परिधीय संपत्तियों पर नजर: कुछ स्थानीय बिचौलियों और सांठगांठ करने वाले लोगों की मदद से ऐसी जमीनों की पहचान की जाती है जो कानूनी विवादों में फंसी हों या जिनके मालिक आर्थिक रूप से कमजोर हों। इन्हें कम दामों पर डरा-धमका कर या प्रभाव का इस्तेमाल कर खरीद लिया जाता है।

नियम विरुद्ध अवैध प्लॉटिंग (The Illegal Plotting Game): इस थ्योरी का एक सबसे महत्वपूर्ण और नया पहलू यह है कि ऐसी जमीनों पर शासन के नियमों के विरुद्ध जाकर अवैध प्लॉटिंग की जाती है। टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (T&CP) और रेरा (Real Estate Regulatory Authority – RERA) जैसी नियामक संस्थाओं से कोई अनुमति (Approval) नहीं ली जाती। बिना डायवर्शन (कृषि भूमि को आवासीय बनाना) और बिना बुनियादी ढांचा (सड़क, बिजली, पानी) विकसित किए, इन जमीनों के छोटे-छोटे टुकड़े कर दिए जाते हैं।

टुकड़ों में बेचना और फंडिंग का आरोप: इन अवैध प्लॉट्स को अपने ही समुदाय या बाहर से आए लोगों को ऊंचे दामों पर या आसान किश्तों पर बेच दिया जाता है, जिससे उस क्षेत्र की जनसांख्यिकी (Demography) तेजी से बदल जाती है। आलोचकों का आरोप है कि इस अवैध रियल एस्टेट के खेल से कमाए गए काले धन (Black Money) का एक बड़ा हिस्सा कथित तौर पर असामाजिक या राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में इस्तेमाल किया जाता है।

रेरा (RERA) और शासन के नियमों का उल्लंघन: एक गंभीर प्रशासनिक चिंता

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रियल एस्टेट क्षेत्र में पारदर्शिता लाने के लिए सरकार ने ‘रेरा’ कानून बनाया है, जिसके तहत किसी भी प्लॉटिंग या कॉलोनी के विकास के लिए पंजीकरण अनिवार्य है। बिना रेरा के प्लॉटिंग करना पूरी तरह से गैर-कानूनी है।

इस कथित खेल में नियमों की धज्जियां निम्नलिखित तरीकों से उड़ाई जाती हैं:

बिना रेरा नंबर के खरीद-बिक्री: आम जनता को झांसा देकर बिना रेरा रजिस्ट्रेशन के प्लॉट बेचे जाते हैं, जिससे बाद में खरीदार कानूनी पचड़े में फंस जाते हैं।

सरकारी जमीनों पर कब्जा: कई बार ग्रीन बेल्ट, सरकारी चरागाह या सीलिंग की जमीनों को भी इस अवैध प्लॉटिंग में शामिल कर लिया जाता है।

मध्यप्रदेश और अन्य राज्यों में कानूनी व प्रशासनिक स्थिति

इन चिंताओं और अवैध कॉलोनियों की बाढ़ को देखते हुए मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों की सरकारों ने कड़े कदम उठाए हैं:

मध्यप्रदेश में माफियाओं और अवैध कॉलोनाइजर्स पर बुल्डोजर एक्शन: मध्यप्रदेश सरकार ने हाल के वर्षों में अवैध कॉलोनियां काटने वालों और भू-माफियाओं के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाई है। इंदौर, भोपाल, जबलपुर और ग्वालियर जैसे बड़े शहरों सहित ग्रामीण इलाकों में भी बिना रेरा और नियमों के विरुद्ध की गई प्लॉटिंग पर प्रशासन ने बुलडोजर चलाकर जमीनों को मुक्त कराया है। स्थानीय संगठनों द्वारा अक्सर ऐसी कार्रवाइयों को ‘लैंड जिहाद’ के खिलाफ एक्शन के रूप में देखा जाता है।

अतिक्रमण हटाओ अभियान: उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश जैसी सरकारों ने भी जंगलों, सरकारी जमीनों और नदी तटों पर अवैध रूप से बनी मजारों, धार्मिक स्थलों और अवैध कॉलोनियों को हटाने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाए हैं।

कानूनी वास्तविकता: भारतीय कानूनी व्यवस्था या संविधान में ‘लैंड जिहाद’ जैसा कोई आधिकारिक शब्द परिभाषित नहीं है। अदालतें और प्रशासन इसे मुख्य रूप से “अवैध कॉलोनाइजेशन” (Illegal Colonization), “रेरा नियमों का उल्लंघन”, और “भू-माफिया गतिविधि” के चश्मे से देखते हैं। यह एक ऐसा अपराध है जिसमें किसी भी समुदाय के अपराधी शामिल हो सकते हैं।

बहस और दूसरा पक्ष (Counter-Perspective)

जहां एक पक्ष इसे एक सोची-समझी जनसांख्यिकीय और आर्थिक साजिश मानता है, वहीं दूसरी ओर समाजशास्त्रियों, कानूनी विशेषज्ञों और विपक्षी दलों का दृष्टिकोण अलग है:

विशुद्ध रियल एस्टेट अपराध: विशेषज्ञों का कहना है कि बिना रेरा के अवैध प्लॉटिंग करना और कृषि भूमि पर अवैध कॉलोनियां काटना भारत के हर छोटे-बड़े शहर की एक आम समस्या है। इसमें हर धर्म, जाति और राजनीतिक रसूख वाले भू-माफिया शामिल होते हैं, जो सिर्फ त्वरित मुनाफे (Fast Profit) के लिए कानून तोड़ते हैं। इसे किसी एक विशेष समुदाय से जोड़कर देखना समाज में वैमनस्य पैदा कर सकता है।

आर्थिक मजबूरी: गरीब और मध्यम वर्ग के लोग सस्ते प्लॉट के चक्कर में अक्सर इन अवैध कॉलोनाइजर्स के जाल में फंस जाते हैं, चाहे बेचने वाला या खरीदने वाला किसी भी मजहब का हो।

निष्कर्ष

‘लैंड जिहाद’ और बिना रेरा के अवैध प्लॉटिंग का यह मुद्दा आज के समय में अत्यधिक संवेदनशील और कानून-व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। जहां एक तरफ नियमों का उल्लंघन करने वाले भू-माफियाओं, अवैध कॉलोनाइजर्स और संदिग्ध फंडिंग की कड़ाई से जांच कर उन पर सख्त प्रशासनिक कार्रवाई होनी चाहिए, वहीं दूसरी तरफ आम नागरिकों को भी जागरूक रहने की जरूरत है ताकि वे बिना रेरा अप्रूवल वाली विवादित संपत्तियों को खरीदकर धोखाधड़ी का शिकार न हों। किसी भी ऐसी संदिग्ध और अवैध गतिविधि की जानकारी तुरंत स्थानीय प्रशासन, रेरा अथॉरिटी या पुलिस को दी जानी चाहिए।

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