मध्य प्रदेश की हाई-प्रोफाइल सीट दतिया विधानसभा पर होने जा रहे उपचुनाव ने राज्य की सियासत में गरमाहट ला दी है। चुनाव आयोग द्वारा घोषित कार्यक्रम के तहत 30 जुलाई को यहां मतदान होना है। कांग्रेस के विधायक राजेंद्र भारती को बैंक धोखाधड़ी के एक मामले में कोर्ट से सजा मिलने के बाद उनकी सदस्यता रद्द हो गई थी, जिसके कारण यह सीट खाली हुई है। इस उपचुनाव में टिकट वितरण से लेकर उम्मीदवारों के चयन तक, कई बड़े उलटफेर देखने को मिले हैं।
1. किसे टिकट मिलने की उम्मीद थी और किसे मिला?
* भाजपा (BJP) का बड़ा उलटफेर: दतिया सीट से पूर्व गृहमंत्री और भाजपा के दिग्गज नेता डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट मिलना लगभग तय माना जा रहा था। नरोत्तम मिश्रा ने चुनावी तैयारियां भी शुरू कर दी थीं और नामांकन पत्र तक खरीद लिया था। लेकिन भाजपा केंद्रीय आलाकमान ने सबको चौंकाते हुए नरोत्तम मिश्रा का टिकट काट दिया और आशुतोष तिवारी को अपना आधिकारिक उम्मीदवार घोषित कर दिया। इस फैसले के बाद नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों में काफी नाराजगी देखी गई और कुछ स्थानों पर पथराव व हाईवे जाम जैसी झड़पों की खबरें भी आईं।
* कांग्रेस (Congress) का दांव: कांग्रेस ने इस सीट से पूर्व विधायक और दतिया राजघराने से ताल्लुक रखने वाले कुंवर घनश्याम सिंह को मैदान में उतारा है। चूंकि पूर्व विधायक राजेंद्र भारती कानूनी वजहों से चुनाव नहीं लड़ सकते, इसलिए कांग्रेस ने अपने इस अनुभवी चेहरे पर भरोसा जताया है।
2. उम्मीदवारों का पूरा प्रोफाइल (Detail Profile)
आशुतोष तिवारी (BJP कैंडिडेट)
* पृष्ठभूमि: आशुतोष तिवारी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की पृष्ठभूमि से आते हैं और बीजेपी के संभागीय संगठन मंत्री रह चुके हैं।
* अनुभव: वे मध्य प्रदेश हाउसिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट बोर्ड (MPHIDB) के चेयरमैन रह चुके हैं, जहां उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त था। उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती का करीबी भी माना जाता है।
* ताकत: संगठन में मजबूत पकड़ और विवादों से दूर एक साफ-सुथरी युवा नेता की छवि।
कुंवर घनश्याम सिंह (Congress कैंडिडेट)
* पृष्ठभूमि: घनश्याम सिंह दतिया के राजघराने से संबंध रखते हैं और क्षेत्र के बड़े और सम्मानित चेहरों में गिने जाते हैं।
* अनुभव: वे दतिया और सेवड़ा विधानसभा क्षेत्रों से पहले भी दो बार कांग्रेस के विधायक रह चुके हैं।
* ताकत: स्थानीय स्तर पर राजघराने का प्रभाव और दतिया व आसपास के ग्रामीण इलाकों में गहरी पैठ।
3. किसकी है मजबूत पकड़ और कौन जीत सकता है?
दतिया सीट पर मुकाबला बेहद कड़ा और दिलचस्प हो गया है। यहां जीत-हार तय करने में निम्नलिखित कारक अहम भूमिका निभाएंगे:
* पॉलिटिकल ट्रैक रिकॉर्ड: 2023 के मुख्य विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने बीजेपी के नरोत्तम मिश्रा को लगभग 7,742 वोटों से हराया था। वहीं, 2008, 2013 और 2018 में यहां से बीजेपी (नरोत्तम मिश्रा) जीतती आ रही थी।
* बीजेपी की चुनौती और रणनीति: नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने से उनके समर्थकों में उपजा असंतोष आशुतोष तिवारी के लिए शुरुआती चुनौती बन सकता है। हालांकि, डैमेज कंट्रोल के लिए बीजेपी ने केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और संगठन के बड़े नेताओं को मोर्चे पर उतारा है। अगर बीजेपी का कैडर एकजुट होकर लड़ता है, तो सत्ताधारी दल होने का फायदा उन्हें मिल सकता है।
* कांग्रेस का पलड़ा: कांग्रेस यहां सहानुभूति और राजघराने के प्रभाव के भरोसे है। घनश्याम सिंह की ग्रामीण मतदाताओं में मजबूत पकड़ है। राजेंद्र भारती के समर्थक भी कांग्रेस को जिताने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं।
> निष्कर्ष: फिलहाल दतिया में ‘कांटे की टक्कर’ है। जमीनी पकड़ के मामले में कांग्रेस के घनश्याम सिंह को उनके पुराने ट्रैक रिकॉर्ड का फायदा मिल रहा है, जबकि बीजेपी के आशुतोष तिवारी के पास सत्ता और संगठन की ताकत है। जीत उसी करवट बैठेगी जो भीतरघात को रोकने और रूठे कार्यकर्ताओं को मनाने में सफल रहेगा।
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दतिया उपचुनाव की घोषणा और कांग्रेस-बीजेपी की तैयारियों के बारे में जमीनी हलचल जानने के लिए आप दतिया उपचुनाव विश्लेषण वीडियो देख सकते हैं, जिसमें इस सीट के खाली होने की पूरी इनसाइड स्टोरी बताई गई है।
दतिया उपचुनाव में डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने के मुख्य कारण
दतिया उपचुनाव में पूर्व गृहमंत्री और भाजपा के कद्दावर नेता डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटना मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा भूचाल लेकर आया है। खुद नरोत्तम मिश्रा चुनाव लड़ने के लिए इतने आश्वस्त थे कि उन्होंने नामांकन फॉर्म तक खरीद लिया था।
राजनीतिक विश्लेषकों, पार्टी सूत्रों और हालिया घटनाक्रमों के आधार पर उनके टिकट कटने के पीछे निम्नलिखित बड़े कारण सामने आए हैं:
1. सत्ता का संतुलन और नया ‘पावर सेंटर’ बनने से रोकना
सबसे अहम कारण राजनीतिक माना जा रहा है। डॉ. नरोत्तम मिश्रा मध्य प्रदेश भाजपा के बड़े और अनुभवी नेता हैं। अगर वे यह उपचुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचते, तो उनके कद को देखते हुए उन्हें मंत्री पद और कोई महत्वपूर्ण विभाग देना लगभग तय था।
मध्य प्रदेश में इस वक्त सीएम मोहन यादव के अलावा ज्योतिरादित्य सिंधिया, कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल जैसे कई कद्दावर नेता पहले से ही अलग-अलग ‘पावर सेंटर’ के रूप में मौजूद हैं।
माना जा रहा है कि बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व फिलहाल सरकार में किसी ‘नए शक्ति केंद्र’ (New Power Center) के उभरने से बचना चाहता था, इसलिए रणनीतिक तौर पर यह फैसला लिया गया।
2. आंतरिक सर्वे और जमीनी फीडबैक
सूत्रों के मुताबिक, चुनाव से पहले दिल्ली स्तर से दतिया क्षेत्र में एक आंतरिक सर्वे कराया गया था।
इस सर्वे में नरोत्तम मिश्रा की स्थिति उम्मीद के मुताबिक उतनी मजबूत नहीं पाई गई।
पार्टी ने केवल चेहरे की लोकप्रियता ही नहीं देखी, बल्कि यह भी आंका कि आने वाले समय में स्थानीय संगठन के भीतर उनकी कितनी स्वीकार्यता रहेगी। 2023 के मुख्य विधानसभा चुनाव में इसी सीट पर नरोत्तम मिश्रा को कांग्रेस के राजेंद्र भारती से हार का सामना करना पड़ा था, जिसे आलाकमान ने गंभीरता से लिया।
3. बेबाक अंदाज और विवाद
नरोत्तम मिश्रा अपनी बेबाक बयानबाजी और मुखर शैली के लिए जाने जाते हैं। कई बार उनके आक्रामक बयानों से विवाद भी खड़े हुए हैं। विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी आलाकमान इस वक्त किसी भी तरह के बेवजह विवाद से बचकर एक शांत और संगठन से जुड़े चेहरे (जैसे आशुतोष तिवारी) को आगे बढ़ाना चाहता था।
4. जातीय समीकरण को साधे रखना
पार्टी ने टिकट काटते समय जातीय और सामाजिक संतुलन बिगड़ने नहीं दिया। नरोत्तम मिश्रा एक बड़े ब्राह्मण चेहरा हैं, इसलिए बीजेपी ने उनकी जगह एक अन्य ब्राह्मण नेता आशुतोष तिवारी को ही टिकट दिया। इससे पार्टी ने सवर्ण वोट बैंक को यह संदेश देने की कोशिश की है कि टिकट किसी विशेष जाति के कारण नहीं, बल्कि स्थानीय समीकरणों के आधार पर बदला गया है।
5. पुराने कद से ज्यादा नए समीकरणों को तरजीह
भाजपा इन दिनों कई राज्यों में अपने कद्दावर और पुराने नेताओं की जगह नए और युवा चेहरों को आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है। दतिया में भी पार्टी ने नरोत्तम मिश्रा के पुराने अनुभव को तरजीह देने के बजाय, भविष्य की राजनीति और नए चुनावी समीकरणों के आधार पर आरएसएस की पृष्ठभूमि वाले आशुतोष तिवारी पर दांव लगाना ज्यादा सुरक्षित समझा।
टिकट कटने के बाद का असर:
इस फैसले की वजह से दतिया में भारी बवाल हुआ। नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने हाईवे पर चक्का जाम किया, पुलिस पर पथराव किया और भाजपा के जिलाध्यक्ष सहित कई पदाधिकारियों ने इस्तीफे दे दिए। हालांकि, नरोत्तम मिश्रा ने खुद मीडिया के सामने आकर पार्टी के फैसले को सर्वोपरि बताया है और अपने समर्थकों से शांति बनाए रखने की अपील की है।
खबर तथ्यों के आधार पर बनाई गई
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