
पर्ची पर ‘भूत-भविष्य’ लिखने वाले धाम में अब डीएनए रिपोर्ट पर अटकी सुई: क्या अंतर्यामी दरबार में अंधा कानून ही असली सच तलाशेगा?
छतरपुर:
जो धाम श्रद्धालुओं के आने से पहले उनका नाम, पता और उनके जेब का हाल पर्ची पर लिखकर तालियां बटोरता रहा है, वह आज खुद कानून के कटघरे और गंभीर सवालों के घेरे में है। बागेश्वर धाम परिसर में एक नाबालिग लड़की के साथ हुए दुष्कर्म के मामले में अदालत की ताजा रिपोर्ट ने तथाकथित ‘दिव्य शक्तियों’ और व्यवस्था दोनों पर तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामले में जिस युवक को पहले आरोपी बनाकर पेश किया गया था, उसका डीएनए सैंपल पीड़िता के डीएनए से मैच नहीं हुआ। इसके बाद अदालत ने मामले की निष्पक्ष और नए सिरे से पुनः जांच के आदेश दिए हैं। डीएनए रिपोर्ट निगेटिव आते ही जांच की सुई अब धाम के आंतरिक सुरक्षा तंत्र और वहां तैनात सेवादारों के इर्द-गिर्द घूमने लगी है।
’मन की बात’ जानने का दावा, लेकिन मुजरिम का सुराग नदारद
बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र शास्त्री के दरबार में रोजाना यह दावा किया जाता है कि वहां बैठे-बैठे किसी की भी सात पीढ़ियों का कच्चा-चिट्ठा खोला जा सकता है। लोग अपनी गुमशुदा गाय, खोई हुई चीजें और भविष्य की योजनाएं पूछने के लिए मीलों दूर से आते हैं। लेकिन जब अपनी ही चौखट पर एक मासूम के साथ हुई इस दरिंदगी का सच सामने लाने की बारी आई, तो सारी ‘दिव्य दृष्टि’ और ‘चमत्कार’ नदारद दिखे।
अब जनता और आलोचक सीधे सवाल दाग रहे हैं:
क्या धाम में घटने वाले अपराध अंतर्यामी की रडार से बाहर होते हैं?
जब एक पर्ची पर किसी के भी गुप्त राज उजागर करने का दावा किया जाता है, तो उस दरिंदे का नाम पर्ची पर लिखकर पुलिस को क्यों नहीं सौंपा गया?
क्या ‘दिव्य दरबार’ का तिलिस्म केवल कैमरों और भक्तों की भीड़ तक ही सीमित है, जबकि हकीकत में इंसाफ के लिए अदालत, फॉरेंसिक टीम और डीएनए टेस्ट की ही जरूरत पड़ती है?

सेवादारों की भूमिका पर संदेह
अदालत के निर्देश के बाद धाम के प्रबंधन और सेवादारों की भूमिका संदेह के घेरे में आ गई है। धाम परिसर में भारी-भरकम निजी सुरक्षा और सेवादारों की फौज होने के बावजूद ऐसी जघन्य घटना कैसे घटी, और डीएनए मैच न होने के बाद असली गुनहगार को बचाने या भटकाने की कोशिश किसने की—यह पुलिसिया जांच का सबसे अहम पहलू बन गया है।
बहरहाल, अदालत के आदेश के बाद पुलिस नए सिरे से साक्ष्य जुटाने में लगी है। वहीं दूसरी ओर, इस पूरे घटनाक्रम ने आस्था के नाम पर चलने वाले चमत्कारी दावों की जमीनी हकीकत को एक बार फिर कठघरे में खड़ा कर दिया है, जहां विज्ञान और कानून की जांच के आगे कथित 'अलौकिक ज्ञान' पूरी तरह खामोश नजर आ रहा है।
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